ऋग्वेद का अवध

लेखक – ललित मिश्र, संस्थापक एवं अध्यक्ष, इंडोलोजी फ़ाउंडेशन

दिनांक 13 अप्रैल 2022

अवध स्थित इक्ष्वाकुओं की अयोध्या में दाशर्थि राम के अवतरण के साथ ही सनातन वैदिक संस्कृति की अक्षुण्ण धारा का वैश्विक प्रवाह शुरू होता है, जिसकी एक धारा मध्य एशिया की पर्वतमालाओं एवं यूराल की उपत्यिका होते हुये, यूरोप की गहराइयों में व्याप्त हो जाती है। ऋग्वेद के दसवें मंडल मे मुनि केशिन गंधर्वो एवं अप्सराओ के क्षेत्र में प्रथम प्रविष्टि की सजीव झांकी प्रस्तुत करते हैं, जिसे उर्जा गति एवं स्थाइत्व मिला दाशर्थि राम के सिंहासनारूढ होने के पश्चात। राम वेदों में अप्राप्य हैं, क्योंकि वेद ऋषियों द्वारा यज्ञ संपादन के मूल 33 देवताओं हेतु निर्मित हुए थे, वहां अलौकिक विष्णु है, लौकिक राम हेतु अपौरुषेय वेद नहीं अपितु वाल्मीकि की रामायण, कृष्ण द्वैपायन व्यास का रामोपाख्यान या प्रचुर मात्रा में उपलब्ध अन्यान्य लौकिक साहित्य है। आर्यावर्त की प्राचीनता के अध्येताओ के सन्मुख एक दुविधा सदैव बनी रही कि जब अथर्ववेद में अयोध्या पुरी (अथर्ववेद-10.2.31) की सशक्त संरचना एवं नगर विन्यास को उपमेय बनाकर स्वस्थ मनुष्य के देह स्थित योग-संभूत अष्टचक्रो से तुलना की गयी गयी है, अर्थात प्रकारांतर से अयोध्या उल्लिखित है ।

“अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या”

अवध भी इसी तरह होना चाहिये था किंतु अयोध्या के पूर्व या समानांतर कालखंड में अवस्थित अवध की खोज अब तक नहीं की जा सकी है, वस्तुतः ऐसा है नहीं, वाचिक शब्दों के माध्यम से ऐतिहासिक जानकारियां निकालने की विधा नयी नहीं है, प्राचीन है । वैदिक वाङ्गमय के अध्येताओ ने ऐसे प्रयास शुरुआती चरण में अवश्य किये थे, किंतु कालांतर में मौलिक शोधों में न्यूनता आ जाने की वजह से शिथिलता आ गयी जिसे दूर करने का समय उपस्थित हुआ है।

वशिष्ठ नामधेय अवध 

अवध के संदर्भ में स्वयं ऋषि वशिष्ठ द्वारा दृष्ट मंत्रो से ही हमारा पथ प्रशस्त होता है, ऋग्वेद में संग्रहीत इन दो मंत्रो में (७.८२.१० एवं ७.८३.१०) ऋषि वशिष्ठ मानो अवध की भावी पीढियों के लिये पाथेय दे रहे हैं, उनके वे संदर्भित मंत्र मन्त्र द्रष्टव्य है, वस्तुतः मंत्र एक ही है जिसे दो सूक्तों में पिरोया गया है, जो कि मंत्र का महत्व दर्शाता है, मंत्र की प्रथम पंक्ति में वशिष्ठ इन्द्र, वरुण एवं मित्र से इस विशाल समतल भू-भाग में सुखद निवास की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करते हैं तथा दूसरी पङ्क्ति में इसी भू-भाग की विशिष्टता रेखांकित करते हुये जिस विशेषण “अ॒व॒ध्रं” का प्रयोग करते हैं, वही कालांतर में इस विस्तृत भू-भाग का नामधेय होता है ।

अ॒स्मे इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा द्यु॒म्नं य॑च्छन्तु॒ महि॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑
अ॒व॒ध्रं ज्योति॒रदि॑तेरृता॒वृधो॑ दे॒वस्य॒ श्लोकं॑ सवि॒तुर्म॑नामहे”
(ऋग्वेद, ७.८२.१० एवं ७.८३.१०)

अ॒व॒ध्रं अर्थात वह क्षेत्र जहां देवमाता अदिति की कृपा से ऋत अर्थात सृष्टि के नौसर्गिक नियमों की सत्ता सतत वृद्धिगामी है, जहां वशिष्ठ निर्मल श्लोकों से सविता रूपी सूर्य की आराधाना करना चाहते हैं । चूंकि अवध में ऊंचे पर्वत-पठार नहीं मिलते, शीतल ज्योत्सना एवं प्रखर आलोक वहां निर्बाध प्राप्त होता है, प्रकाश की बाधा ही उसकी हिंसा होती है, निर्बाध प्रकाश हेतु ऋषियों ने उनकी अपनी भाषा में जिस शब्द को गढा वह “अवध्र” है । वैदिक “अ॒व॒ध्र” से लौकिक “अवध” का निर्माण भषा-विज्ञान की स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग है, ऋत की वृद्धि करने वाला यह अहिंस्र भूखंड अवध के नाम से जाना गया, इस तरह वशिष्ठ द्वारा अवध का नामकरण हुआ ।

अयोध्या का प्रथम नवनिर्माण

ऐसा प्रतीत होता है कि मांधाता के समय तक अवध के इक्ष्वाकु साम्राज्य का वर्चस्व सिंधु नदी तक हो चुका था, सिंधु के किनारे मांधाता आयोजित यज्ञ के दौरान दस्युओ के साथ संघर्ष हुआ “म॒न्धा॒तुः द॒स्यु॒हन्ऽत॑मम्” (ऋग्वेद, ८.३९.८) जिसमें बहुत से दस्यु मारे गये, तथा इसी वर्चस्य की रक्षा हेतु राम ने लव को वर्तमान लाहौर का क्षेत्र राज्य हेतु प्रदान किया होगा लाहौर के शाही किले के भीतर महाराज लव के नाम पर एक मंदिर भी निर्मित है, जिसके प्रवेश द्वार पर सूर्यवंशीय रघुकुल का प्रतीक सूर्य का साक्षात अंकन है, कृपया संलग्न चित्र में देखें जिसमें पूजा अर्चना यद्यपि बंद है, तथापि यह सुदूर अतीत स्मरण कराने हेतु एक जीवंत साक्ष्य अवश्य है ।

लाहौर का लव मंदिर

वाल्मीकि ने उत्तरकांड में तथा कालिदास ने रघुवंश में लिखा है कि श्री राम ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कुश को कुशावती का साम्राज्य प्रदान किया था। इस समय तक अयोध्या श्री-विहीन जर्जर अवस्था को प्राप्त हो गयी थी, रघुवंश के अनुसार एक दिन अयोध्या वृद्धा स्त्री का रूप ग्रहण कर, कुश के स्वप्न में आकर उन्हे अपनी व्याकुलता से अवगत कराती है, जिसके पश्चात कुश अयोध्या को अपनी राजधानी बनाते हैं, वहां नव-निर्माण होता है तथा अयोध्या अपने खोये हुये वैभव को पुनः प्राप्त करती है |

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